2. नववर्ष की पूर्व संध्या पर गोमती तट पर दीपदान तथा महिला-शक्ति द्वारा भजन संध्या का आयोजन ।
3. भारतीय नववर्ष के शुभकामना-संदेशों का डाक तथा इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से प्रेषित करना ।
4. भारतीय नववर्ष के उत्सव हेतु जनपद में वृहत् स्तर पर सांस्कृतिक संध्या का सार्वजनिक रूप में आयोजन करना ।
5. "नव चैतन्य" वार्षिक पत्रिका का नियमित प्रकाशन ।
6. विक्रम संवत के अनुसार वार्षिक कैलेण्डर/पन्चाड्.ग का प्रकाशन एवं जनसामान्य में वितरण।
7. समिति के अथक प्रयत्न एवं उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल श्री राम नाईक के अद्वितीय प्रयास से भारत सरकार के संचार मंत्रालय द्वारा सम्राट विक्रमादित्य पर डाक टिकट का लोकार्पण पौष कृष्ण नवमी, वि.सं. 2073 तदनुसार दिनांक 22 दिसम्बर, 2016 को राजभवन, लखनऊ में हुआ।
8. फाल्गुन कृष्ण चतुर्थी, विक्रम संवत 2075,तदनुसार दिनांक 23फरवरी, 2019 को लखनऊ विश्वविद्यालय एवं नववर्ष चेतना समिति के संयुक्त तत्वावधान में 'भारतीय इतिहास में सम्राट् विक्रमादित्य ' विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया,जिसमें भारत वर्ष के मूर्धन्य विद्वान उपस्थित थे। संगोष्ठी के मुख्य अतिथि के रूप में श्री ह्रदय नारायण दीक्षित (विधानसभा अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश) एवं अध्यक्षता श्री राजनाथ सिंह 'सूर्य '(अब स्मृति शेष) द्वारा की गई थी।
9. समिति के अनुरोध पर वैशाख कृष्ण दशमी वि.सं. 2076,तदनुसार दिनांक 29अप्रैल, 2019को लखनऊ विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद् द्वारा सम्राट् विक्रमादित्य की आदमकद प्रतिमा लखनऊ विश्वविद्यालय परिसर में स्थापित किए जाने का निर्णय लिया गया।
सम्राट विक्रमादित्य भारतीय इतिहास के एक महान और आदर्श राजा माने जाते हैं। वे उज्जयिनी (वर्तमान उज्जैन) के शासक थे और उनके शासनकाल को भारत के स्वर्ण युगों में गिना जाता है। न्यायप्रियता, पराक्रम, दानशीलता और विद्वानों के संरक्षण के लिए वे विशेष रूप से प्रसिद्ध थे।
सम्राट विक्रमादित्य अपने निष्पक्ष और त्वरित न्याय के लिए जाने जाते थे। कहा जाता है कि वे स्वयं वेश बदलकर प्रजा की समस्याएँ सुनते थे और बिना किसी भेदभाव के न्याय करते थे। उनके न्याय की कथाएँ आज भी लोककथाओं में जीवित हैं।
विक्रमादित्य एक महान योद्धा थे। उन्होंने विदेशी आक्रांताओं को पराजित किया और अपने राज्य की सीमाओं की रक्षा की। उनके शौर्य और साहस के कारण ही उन्हें “सम्राट” की उपाधि प्राप्त हुई।
सम्राट विक्रमादित्य के दरबार में नवरत्न जैसे महान विद्वान, कवि और ज्योतिषी थे। महाकवि कालिदास उन्हीं में से एक थे। उनके शासनकाल में साहित्य, कला, विज्ञान और ज्योतिष का अभूतपूर्व विकास हुआ।
सम्राट विक्रमादित्य ने विक्रम संवत की स्थापना की, जो आज भी भारत में धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यों में प्रयोग किया जाता है। यह भारतीय कालगणना का एक महत्वपूर्ण आधार है।
सम्राट विक्रमादित्य की बुद्धिमत्ता, साहस और नैतिकता को दर्शाने वाली कथाएँ सिंहासन बत्तीसी और बेताल पच्चीसी के माध्यम से आज भी प्रचलित हैं।
सम्राट विक्रमादित्य केवल एक शासक नहीं थे, बल्कि आदर्श नेतृत्व, न्याय और सांस्कृतिक उत्कर्ष के प्रतीक थे। उनका जीवन आज भी हमें सत्य, धर्म और कर्तव्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।